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May 6, 2009

दुश्वारी


मैं भूल जाऊं तुम्हे

अब येही मुनासिब है

मगर भूलना भी चाहूँ

तो किस तरह भूलूं

की तुम तो फ़िर भी हकीकत हो

कोई ख्वाब नहीं

यहाँ तो दिल का ये

आलम है क्या कहूँ

कमबख्त!

भूला न पाया ये वोह सिलसिला

जो था ही नहीं

वो एक ख्याल

जो आवाज तक गया ही नहीं

वो एक बात

जो मैं कह नहीं सका तुमसे

वो एक रब्त

जो हममे कभी रहा ही नहीं

मुझे है याद वो सब

जो कभी हुआ ही नहीं


जावेद अख्तर


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